अध्याय 5: औपनिवेशिक शिक्षा नीति और भारतीय भाषाओं का प्रश्न
Synopsis
मैकॉले की शिक्षा नीति और भारतीय भाषाओं पर प्रभाव
1835 में थॉमस मैकॉले के “मिनट ऑन एजुकेशन” ने भारत की शिक्षा व्यवस्था की दिशा बदल दी। इस नीति ने अंग्रेज़ी को शिक्षा का प्रमुख माध्यम बना दिया, जिससे भारतीय भाषाएँ शिक्षण से बाहर हो गईं। इससे न केवल भाषाई विविधता पर आघात हुआ, बल्कि भारतीय संस्कृति की जड़ें भी कमजोर हुईं। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान-संवर्धन से हटकर प्रशासनिक कार्यकुशलता तक सीमित रह गया।
1835 में लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने अपने प्रसिद्ध दस्तावेज़ “मिनट ऑन एजुकेशन” के माध्यम से भारत की शिक्षा व्यवस्था को ब्रिटिश उपनिवेशवादी हितों के अनुरूप पुनर्गठित करने की दिशा दी। इस नीति का मूल उद्देश्य भारतीय समाज में ऐसे लोगों की एक नई श्रेणी तैयार करना था जो “रक्त और रंग से भारतीय” हों, लेकिन “विचार, रुचि, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज़ी” हों। परिणामस्वरूप, अंग्रेज़ी को शिक्षा का मुख्य माध्यम घोषित कर दिया गया और भारतीय भाषाओं-विशेषकर संस्कृत, हिन्दी, बंगला, तमिल और मराठी-को उच्च शिक्षा के क्षेत्र से लगभग बाहर कर दिया गया।
इस नीति का गहरा प्रभाव भारतीय भाषाई और सांस्कृतिक परंपराओं पर पड़ा। जहाँ पहले शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण, नैतिकता, और सामाजिक उत्तरदायित्व था, वहीं मैकॉले की नीति ने इसे नौकरशाही के लिए प्रशिक्षित कर्मियों के निर्माण तक सीमित कर दिया। भारतीय भाषाओं में निहित दर्शन, साहित्य और लोकज्ञान हाशिये पर चले गए। इसने भारतीय समाज में एक भाषाई और सांस्कृतिक विभाजन पैदा किया-एक ओर अंग्रेज़ी शिक्षित अभिजात वर्ग और दूसरी ओर स्थानीय भाषाओं में शिक्षित जनसामान्य।
मैकॉले की नीति का प्रभाव केवल भाषा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भारतीय आत्मबोध और ज्ञान-परंपरा पर भी गहरा आघात था। शिक्षा में अंग्रेज़ी वर्चस्व ने भारतीय छात्रों को अपनी जड़ों से दूर कर दिया, जिससे भारतीय संस्कृति की मौलिकता कमजोर हुई। भारतीय भाषाओं की शिक्षा को “अप्रासंगिक” बताकर हाशिये पर डाल दिया गया, जबकि वास्तव में ये भाषाएँ भारतीय समाज की सांस्कृतिक विविधता और संवेदनशीलता की वाहक थीं।
