अध्याय 6: स्वतंत्रता के बाद हिन्दी शिक्षा की स्थिति और चुनौतियाँ

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स्वतंत्र भारत में हिन्दी की संवैधानिक स्थिति

1949 में संविधान सभा ने हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। यह निर्णय हिन्दी के लिए ऐतिहासिक था, क्योंकि इससे शिक्षा, प्रशासन और साहित्य के क्षेत्र में इसकी भूमिका मजबूत हुई। परंतु साथ ही, यह बहुभाषी भारत में संतुलन की चुनौती भी लेकर आया। शिक्षा में हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए अनेक आयोग और समितियाँ गठित की गईं, जैसे - कौठारी आयोग (1964–66), जिसने तीन-भाषा सूत्र की सिफारिश की।

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी भाषा निर्धारित करने की थी जो राष्ट्र की एकता, प्रशासनिक सुचारुता और सांस्कृतिक विविधता का संतुलन बनाए रख सके। इस संदर्भ में 1949 में संविधान सभा ने व्यापक चर्चा के बाद हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। यह निर्णय केवल भाषायी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा हुआ था। हिन्दी को देवनागरी लिपि में अपनाने का निर्णय लिया गया, जिससे इसे भारतीय भाषाओं के बीच एक साझा सेतु के रूप में देखा गया।

संविधान के अनुच्छेद 343 में यह स्पष्ट किया गया कि संघ की राजभाषा हिन्दी होगी और उसका लिपि रूप देवनागरी होगा। साथ ही, यह भी निर्धारित किया गया कि प्रारंभिक पंद्रह वर्षों तक अंग्रेज़ी का उपयोग सहायक राजभाषा के रूप में किया जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखना था, क्योंकि तत्कालीन समय में अंग्रेज़ी का प्रयोग व्यापक रूप से प्रचलित था।

Published

January 3, 2026

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How to Cite

अध्याय 6: स्वतंत्रता के बाद हिन्दी शिक्षा की स्थिति और चुनौतियाँ. (2026). In हिंदी शिक्षा और भारतीय परंपराएँ: आलोचनात्मक दृष्टि. Wissira Press. https://books.wissira.us/index.php/WIL/catalog/book/107/chapter/873