अध्याय 9: आधुनिक हिंदी साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा
Synopsis
आधुनिक साहित्य का उद्भव
भारतेंदु युग से हिंदी साहित्य में आधुनिकता, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक चेतना का उदय हुआ।
हिंदी साहित्य में आधुनिकता का आरंभ भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) के युग से माना जाता है। इसे भारतेंदु युग भी कहा जाता है। इस काल में साहित्य ने केवल मनोरंजन या काव्य-रस तक सीमित न रहकर राष्ट्रप्रेम, सामाजिक सुधार और जागरण की दिशा पकड़ी। भारतेंदु स्वयं कवि, नाटककार और गद्य लेखक थे, जिन्होंने साहित्य को समकालीन समाज की समस्याओं से जोड़ा।
आधुनिकता का आधार
भारतेंदु युग में आधुनिकता का भाव अंग्रेजी शिक्षा, पश्चिमी विचारधारा और राष्ट्रीय पुनर्जागरण से जुड़ा हुआ था। तत्कालीन हिंदी साहित्य ने अंधविश्वास, सामाजिक कुरीतियों, दहेज, पर्दा प्रथा और अशिक्षा के विरुद्ध आवाज़ उठाई। लेखकों ने अपने लेखन को सामाजिक सुधार और जागृति का उपकरण बनाया।
राष्ट्रप्रेम और स्वतंत्रता चेतना
भारतेंदु हरिश्चंद्र की कविताएँ और नाटकों में स्पष्ट रूप से राष्ट्रप्रेम झलकता है। "भारत दुर्दशा" जैसे नाटक में अंग्रेजी शासन के शोषण को व्यंग्यात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया। साहित्य राष्ट्रीय एकता और स्वाधीनता की भावना का माध्यम बना।
सामाजिक चेतना का स्वर
भारतेंदु युग में लिखी गई रचनाओं में समाज के यथार्थ और पीड़ा का सजीव चित्रण मिलता है। लेखकों ने समाज की बुराइयों पर प्रहार कर सुधारवादी दृष्टिकोण अपनाया। महिला शिक्षा, विधवा विवाह और जातिगत भेदभाव जैसे मुद्दों पर जागरूकता पैदा हुई।
भाषा और शैली
इस काल में खड़ीबोली हिंदी को साहित्यिक भाषा का रूप देने की दिशा में प्रयास हुआ। गद्य लेखन की परंपरा मजबूत हुई और पत्रकारिता ने हिंदी साहित्य को नया आयाम दिया।
