अध्याय 10: हिंदी आलोचना और भारतीय ज्ञानमीमांसा

Authors

Synopsis

आलोचना का उद्भव   
हिंदी आलोचना का आरंभ संस्कृत अलंकारशास्त्र और रस सिद्धांत की परंपरा से हुआ।

हिंदी आलोचना का विकास किसी एक समय या घटना से अचानक नहीं हुआ, बल्कि यह एक दीर्घ परंपरा और बौद्धिक प्रवाह का परिणाम है। इसका प्रारंभ संस्कृत साहित्य की आलोचनात्मक परंपरा—अलंकारशास्त्र और रस सिद्धांत—से हुआ। संस्कृत के आचार्य भरत, भामह, आचार्य आनंदवर्धन और आचार्य मम्मट ने साहित्य के सौंदर्य, उसकी अभिव्यक्ति और उसके प्रभाव पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया।

इन आचार्यों की परंपरा हिंदी आलोचना की नींव बनी। उदाहरण के लिए, रस सिद्धांत ने यह मान्यता दी कि साहित्य का मूल उद्देश्य ‘आनंद’ और ‘रसानुभूति’ है, जबकि अलंकार शास्त्र ने साहित्य को भाषा-सौंदर्य, शैली और शिल्प की दृष्टि से परखा। हिंदी के प्राचीन कवियों—विशेषकर भक्तिकालीन और रीतिकालीन—की रचनाओं का मूल्यांकन इसी दृष्टिकोण से किया जाता रहा।

आलोचना के इस आरंभिक चरण में मुख्य रूप से काव्य की भाषा, शैली, अलंकार और रस की व्याख्या पर ध्यान केंद्रित किया गया। धीरे-धीरे यह परंपरा हिंदी साहित्य में विकसित हुई और आलोचना केवल काव्य-सौंदर्य तक सीमित न रहकर समाज, संस्कृति और विचारधारा की व्याख्या का साधन भी बनी।

इस प्रकार, हिंदी आलोचना का उद्भव संस्कृत की दार्शनिक एवं साहित्यिक परंपरा में निहित है, जिसने आगे चलकर आधुनिक हिंदी आलोचना के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

Published

January 3, 2026

License

Creative Commons License

This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.

How to Cite

अध्याय 10: हिंदी आलोचना और भारतीय ज्ञानमीमांसा. (2026). In हिंदी साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा. Wissira Press. https://books.wissira.us/index.php/WIL/catalog/book/118/chapter/991