अध्याय 6: दिल्ली सल्तनत और सामाजिक परिवर्तन

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दिल्ली सल्तनत की स्थापना        
मोहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 में दिल्ली सल्तनत की नींव रखी।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बारहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण काल था। इस समय उत्तर भारत में कई छोटे-बड़े राजवंश सत्ता में थे, जिनमें चौहान, गहड़वाल और अन्य क्षेत्रीय शासक शामिल थे। इसी समय मध्य एशिया से तुर्क शासक मोहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण करना शुरू किया। तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) में उसकी हार हुई, परंतु 1192 ई. के दूसरे युद्ध में उसने पृथ्वीराज चौहान को पराजित कर दिया। इस विजय के परिणामस्वरूप दिल्ली और अजमेर पर उसका अधिकार स्थापित हुआ।

मोहम्मद गौरी और उसका उत्तराधिकार

मोहम्मद गौरी ने भारत में स्थायी शासन की योजना बनाई, किंतु 1206 ई. में ग़ज़नी लौटते समय उसकी हत्या कर दी गई। उसके कोई पुत्र नहीं था, इसलिए उसने अपने दासों और सेनापतियों को अपने साम्राज्य का उत्तराधिकारी बनाया। इन्हें "ममलूक" कहा जाता था।

कुतुबुद्दीन ऐबक का उदय

कुतुबुद्दीन ऐबक मोहम्मद गौरी का सबसे विश्वसनीय दास और सेनापति था। गौरी ने उसे भारत के प्रशासन और सैन्य गतिविधियों की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। गौरी की मृत्यु के बाद ऐबक ने दिल्ली को अपना केंद्र बनाकर स्वतंत्र शासक के रूप में शासन प्रारंभ किया। 1206 ई. को ही "दिल्ली सल्तनत" की स्थापना का वर्ष माना जाता है।

कुतुबुद्दीन ऐबक का शासन

ऐबक को अपनी उदारता और दानशीलता के कारण "लाखबख्श" कहा जाता था। उसने कला और स्थापत्य को प्रोत्साहन दिया। उसके शासनकाल में –

  • दिल्ली और अजमेर में कुव्वत-उल-इस्लाम तथा अढ़ाई दिन का झोंपड़ा जैसी मस्जिदों का निर्माण हुआ।
  • कुतुब मीनार का निर्माण प्रारंभ हुआ, जिसे बाद में इल्तुतमिश ने पूरा किया।
  • उसने अनेक हिंदू मंदिरों को मस्जिदों में परिवर्तित किया, जो तत्कालीन धार्मिक और राजनीतिक नीति का हिस्सा था।

चुनौतियाँ और सीमाएँ

कुतुबुद्दीन ऐबक का शासन केवल चार वर्षों (1206–1210 ई.) तक ही चल सका। उसकी मृत्यु एक खेल के दौरान घोड़े से गिरने से हो गई। उसके बाद उसका दामाद इल्तुतमिश सत्ता में आया और उसने दिल्ली सल्तनत को एक संगठित और शक्तिशाली साम्राज्य में बदल दिया।

दिल्ली सल्तनत की स्थापना का महत्व

1.       राजनीतिक महत्व – भारत में पहली बार तुर्क शासकों ने एक केंद्रीकृत सत्ता की नींव रखी।

2.       सांस्कृतिक प्रभाव – इस काल से इस्लामी स्थापत्य कला, अरबी-फ़ारसी भाषा और तुर्की संस्कृति का प्रभाव भारतीय समाज पर पड़ा।

3.       प्रशासनिक ढाँचा – तुर्कों ने दास-प्रथा और जागीर प्रणाली जैसी व्यवस्थाएँ लागू कीं।

4.       धार्मिक नीति – इस्लाम के प्रसार के लिए मस्जिदों और मदरसों की स्थापना

Published

January 3, 2026

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How to Cite

अध्याय 6: दिल्ली सल्तनत और सामाजिक परिवर्तन. (2026). In भारतीय इतिहास की धड़कन: प्राचीन से आधुनिक उत्तर भारत. Wissira Press. https://books.wissira.us/index.php/WIL/catalog/book/121/chapter/1019