अध्याय 10: स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रवाद
Synopsis
प्रारंभिक राष्ट्रवाद
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) की स्थापना ने राष्ट्रवाद को संगठित रूप दिया। प्रारंभिक नेता सुधार और संवाद पर जोर देते थे।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम चरण, जिसे प्रारंभिक राष्ट्रवाद कहा जाता है, भारतीय राजनीति और समाज के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस दौर की शुरुआत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress) की स्थापना से मानी जाती है, जो 1885 में ए. ओ. ह्यूम (A. O. Hume), दादाभाई नौरोजी, वुमेश चंद्र बनर्जी और अन्य नेताओं के सहयोग से स्थापित हुई। कांग्रेस ने पहली बार राष्ट्रवाद को संगठित और संस्थागत रूप दिया।
संगठन और नेतृत्व
कांग्रेस के शुरुआती नेताओं को "मॉडरेट्स" (Moderates) कहा जाता है। इन नेताओं में दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फेरोजशाह मेहता और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी प्रमुख थे। उनका विश्वास था कि भारत की समस्याओं का समाधान शांतिपूर्ण संवाद, याचिकाओं और सुधारवादी उपायों से निकाला जा सकता है। वे ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्रता की बजाय प्रशासन में सुधार, भारतीयों की भागीदारी और न्यायपूर्ण शासन की मांग करते थे।
प्रमुख मांगें और विचारधारा
मॉडरेट नेताओं की मांगें ब्रिटिश संसद में सुधार लाने, प्रशासनिक सेवाओं में भारतीयों की हिस्सेदारी बढ़ाने, शिक्षा का प्रसार करने और भारतीय उद्योग-व्यापार को प्रोत्साहन देने तक सीमित थीं। दादाभाई नौरोजी का "ड्रेन ऑफ वेल्थ" सिद्धांत इस दौर की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक आलोचना थी, जिसमें उन्होंने बताया कि किस प्रकार भारत से धन का निर्यात ब्रिटेन की समृद्धि का आधार बन रहा है।
संघर्ष का तरीका
इस चरण में संघर्ष का स्वरूप अहिंसक और संवैधानिक था। मॉडरेट नेता ब्रिटिश सरकार से अपेक्षा रखते थे कि वह भारत के हितों को समझेगी और क्रमिक सुधारों को लागू करेगी। याचिकाएँ भेजना, प्रतिनिधित्व करना, संसद में चर्चा कराना और प्रशासनिक सुधारों के लिए निवेदन करना उनकी प्रमुख रणनीतियाँ थीं।
सीमाएँ और आलोचना
हालाँकि प्रारंभिक राष्ट्रवाद ने भारतीयों में राजनीतिक चेतना जगाने का कार्य किया, लेकिन यह सीमित वर्ग – प्रायः शिक्षित मध्यमवर्ग – तक ही सीमित रहा। किसानों, मजदूरों और व्यापक जनसमुदाय की भागीदारी इस चरण में न्यूनतम थी। इसके कारण इन नेताओं पर अंग्रेज़ों से अत्यधिक आशा रखने और संघर्ष की कठोर राह से बचने की आलोचना भी हुई।
ऐतिहासिक महत्व
प्रारंभिक राष्ट्रवाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का बौद्धिक और संगठनात्मक आधार बना। इसने आगे चलकर गरमपंथी राष्ट्रवादियों (बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल) के लिए रास्ता तैयार किया, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को जनांदोलन का रूप दिया।
