अध्याय-1 शासन और राजनीतिक विचार की उत्पत्ति
Synopsis
प्राचीन सभ्यताओं में शासन की अवधारणा
मानव समाज के संगठित होने के साथ ही शासन की आवश्यकता उत्पन्न हुई। प्रारंभिक सभ्यताओं-मेसोपोटामिया, मिस्र, सिंधु और चीन-में शासन का उद्देश्य व्यवस्था बनाए रखना, संसाधनों का वितरण करना और बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करना था। शासन प्रायः राजा या प्रमुख के हाथों में केंद्रित रहता था, जिसे दैवी शक्ति का प्रतिनिधि माना जाता था।
मानव समाज जब छोटे कबीलाई समूहों से विकसित होकर स्थायी बस्तियों और नगरों में बदलने लगा, तब सामाजिक समन्वय और संसाधनों के प्रबंधन के लिए एक संगठित व्यवस्था की आवश्यकता स्पष्ट हुई। यही आवश्यकता आगे चलकर शासन की अवधारणा का आधार बनी। प्राचीन सभ्यताओं में शासन केवल सत्ता का प्रयोग नहीं था, बल्कि सामाजिक संतुलन, सुरक्षा और उत्पादन प्रणाली के संचालन का माध्यम भी था।
मेसोपोटामिया में नगर-राज्यों की व्यवस्था विकसित हुई, जहाँ शासक धार्मिक और राजनीतिक दोनों अधिकारों का प्रयोग करता था। कानूनों का संहिताकरण-जैसे कठोर दंड व्यवस्था-सामाजिक अनुशासन बनाए रखने का साधन बना। मिस्र में फ़राओ को देवतुल्य माना जाता था; उसकी सत्ता केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक भी थी। इससे शासन को वैधता और स्थायित्व मिला।
सिंधु सभ्यता में शासन का स्वरूप अपेक्षाकृत संगठित और व्यवस्थित प्रतीत होता है। यहाँ नगर नियोजन, जल निकासी प्रणाली और व्यापारिक नेटवर्क यह संकेत देते हैं कि प्रशासनिक ढाँचा सुव्यवस्थित था, भले ही स्पष्ट राजसत्ता के प्रमाण सीमित हों। चीन की प्राचीन राजवंशीय व्यवस्था में शासक को “स्वर्ग की आज्ञा” (Mandate of Heaven) का प्रतिनिधि माना गया, जिससे शासन की नैतिक जिम्मेदारी भी निर्धारित हुई।
इन सभी सभ्यताओं में कुछ समान तत्व दिखाई देते हैं-सत्ता का केंद्रीकरण, कानूनों की स्थापना, कर संग्रह की व्यवस्था, सेना या सुरक्षा तंत्र, और धार्मिक वैधता। शासन का मुख्य उद्देश्य आंतरिक व्यवस्था बनाए रखना, आर्थिक गतिविधियों को संगठित करना और बाहरी खतरों से रक्षा करना था। इसी प्रक्रिया में राज्य, प्रशासन और न्याय की भूमिकाएँ स्पष्ट होने लगीं।
इस प्रकार, प्राचीन सभ्यताओं में शासन की अवधारणा केवल राजनीतिक नियंत्रण तक सीमित नहीं थी, बल्कि सामाजिक संगठन, नैतिक अनुशासन और सामूहिक सुरक्षा की समग्र व्यवस्था थी, जिसने आधुनिक राज्य की नींव रखी।
उदाहरण: मेसोपोटामिया में शासन व्यवस्था
हम्मुराबी और विधि संहिता
मेसोपोटामिया की बेबीलोन सभ्यता में राजा हम्मुराबी (लगभग 18वीं शताब्दी ईसा पूर्व) ने शासन को व्यवस्थित रूप देने के लिए एक विस्तृत कानून संहिता लागू की। यह इतिहास की सबसे प्राचीन लिखित विधि व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है।
शासन की विशेषताएँ:
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कानूनों का संहिताकरण
हम्मुराबी ने लगभग 282 नियमों को पत्थर की शिला पर खुदवाया। इसमें चोरी, व्यापार, विवाह, ऋण, मजदूरी और दंड से संबंधित स्पष्ट प्रावधान थे। इससे शासन मनमाने निर्णयों के बजाय लिखित नियमों पर आधारित हुआ।
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सामाजिक नियंत्रण और न्याय
“आँख के बदले आँख” जैसी दंड व्यवस्था का उद्देश्य अपराधों को रोकना और सामाजिक संतुलन बनाए रखना था। यह दर्शाता है कि न्याय प्रणाली शासन का केंद्रीय भाग थी।
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दैवी वैधता
हम्मुराबी स्वयं को देवताओं द्वारा
