अध्याय-3 राजतंत्र से लोकतंत्र तक का संक्रमण
Synopsis
निरंकुश राजतंत्र का स्वरूप
निरंकुश राजतंत्र में सत्ता पूर्णतः राजा के हाथों में केंद्रित होती थी। कानून, प्रशासन और न्याय सभी शासक की इच्छा पर निर्भर थे। प्रजा की राजनीतिक भागीदारी सीमित या नगण्य थी। यह व्यवस्था स्थिरता तो प्रदान करती थी, परंतु जवाबदेही और अधिकारों की कमी के कारण असंतोष भी उत्पन्न करती थी।
निरंकुश राजतंत्र वह शासन प्रणाली थी जिसमें राज्य की समस्त शक्ति एक ही व्यक्ति-राजा-के हाथों में केंद्रित रहती थी। राजा ही सर्वोच्च विधि निर्माता, प्रशासक और न्यायाधीश माना जाता था। उसकी इच्छा ही कानून बन जाती थी, और उसके निर्णय के विरुद्ध कोई संवैधानिक या संस्थागत चुनौती प्रायः संभव नहीं होती थी।
इस प्रकार की व्यवस्था में शासन की संरचना ऊपर से नीचे की ओर चलती थी। राजा के आदेशों का पालन मंत्री, दरबारी या स्थानीय अधिकारी करते थे, लेकिन अंतिम अधिकार राजा के पास ही सुरक्षित रहता था। प्रजा को शासन प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर नहीं मिलता था; न तो वे नीति निर्माण में शामिल होते थे और न ही शासक को उत्तरदायी ठहरा सकते थे।
निरंकुश शासन का एक पक्ष यह था कि निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज और केंद्रीकृत होती थी। इससे प्रशासनिक एकरूपता और तत्कालिक स्थिरता संभव होती थी। युद्ध, कर नीति या आंतरिक सुरक्षा जैसे मामलों में शीघ्र निर्णय लेना आसान था। लेकिन दूसरी ओर, सत्ता के इस अत्यधिक केंद्रीकरण से नागरिक अधिकारों का हनन, मनमानी कर व्यवस्था और दमनकारी नीतियाँ भी जन्म ले सकती थीं।
चूंकि शासक पर किसी प्रकार की संवैधानिक रोक या जन-नियंत्रण नहीं होता था, इसलिए यदि राजा न्यायप्रिय और दूरदर्शी होता तो राज्य समृद्ध हो सकता था; परंतु यदि वह अत्याचारी या स्वार्थी होता, तो प्रजा के लिए परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन हो जाती थीं। यही कारण है कि समय के साथ कई समाजों में निरंकुश राजतंत्र के विरुद्ध असंतोष बढ़ा और संवैधानिक तथा लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की मांग ने जन्म लिया।
उदाहरण: Louis XIV (फ्रांस)
फ्रांस के राजा लुई चौदहवें (1643–1715) को निरंकुश राजतंत्र का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण माना जाता है। उन्हें “Sun King” भी कहा जाता था। उनका प्रसिद्ध कथन था - “L'État, c'est moi” अर्थात “राज्य मैं ही हूँ।” यह कथन उनके शासन की प्रकृति को स्पष्ट करता है - राज्य की समस्त शक्ति राजा में निहित थी।
सत्ता का केंद्रीकरण
लुई XIV ने समस्त प्रशासनिक अधिकार अपने हाथ में रखे। कानून बनाना, कर लगाना, युद्ध का निर्णय लेना-सब कुछ उनकी स्वीकृति से होता था। संसद या जनप्रतिनिधि संस्थाएँ प्रभावहीन थीं।
वर्साय महल और नियंत्रण
उन्होंने वर्साय का भव्य महल बनवाया और वहाँ दरबार स्थापित किया। यह केवल वैभव का प्रतीक नहीं था, बल्कि राजनीतिक रणनीति भी थी। उन्होंने सामंतों (नौबल्स) को अपने नियंत्रण में रखने के लिए उन्हें दरबार से जोड़े रखा, जिससे वे स्वतंत्र शक्ति केंद्र न बन सकें।
प्रजा की सीमित भूमिका
साधारण नागरिकों की शासन में कोई भागीदारी नहीं थी। करों का भार अधिकतर किसानों और मध्यम वर्ग पर पड़ता था। राजा के निर्णयों पर प्रश्न उठाने की कोई
