अध्याय -5 20वीं शताब्दी के राजनीतिक कालखंड
Synopsis
विश्व युद्ध और वैश्विक सत्ता संतुलन
20वीं शताब्दी के दो विश्व युद्धों ने वैश्विक राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। साम्राज्यों का पतन हुआ और नई राजनीतिक शक्तियाँ उभरीं। युद्धों के परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय संबंधों की नई संरचना विकसित हुई, जिसमें सामूहिक सुरक्षा और कूटनीतिक सहयोग की आवश्यकता महसूस की गई।
20वीं शताब्दी के दोनों विश्व युद्ध केवल सैन्य संघर्ष नहीं थे, बल्कि उन्होंने वैश्विक राजनीति की दिशा ही बदल दी। पहले विश्व युद्ध के बाद कई पुराने साम्राज्य-जैसे ऑस्ट्रो-हंगेरियन, उस्मानी (ऑटोमन) और जर्मन साम्राज्य-टूट गए। इसके परिणामस्वरूप यूरोप का राजनीतिक मानचित्र बदल गया और कई नए राष्ट्र-राज्यों का उदय हुआ। इसी दौर में राष्ट्रवाद, आत्मनिर्णय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसी अवधारणाएँ प्रमुख हुईं। यद्यपि युद्ध को रोकने के उद्देश्य से राष्ट्र संघ की स्थापना की गई, परंतु उसकी सीमाएँ स्पष्ट रहीं, जिससे द्वितीय विश्व युद्ध को रोका नहीं जा सका।
द्वितीय विश्व युद्ध ने वैश्विक शक्ति-संतुलन को और अधिक निर्णायक रूप से बदल दिया। यूरोपीय शक्तियों का प्रभुत्व कमजोर पड़ा और संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत संघ महाशक्ति के रूप में उभरे। इसने द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था को जन्म दिया, जिसे शीत युद्ध के नाम से जाना गया। इस अवधि में वैचारिक प्रतिस्पर्धा-पूंजीवाद बनाम साम्यवाद-अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्रीय तत्व बन गई। परमाणु हथियारों के विकास ने शक्ति-संतुलन को और जटिल बना दिया, क्योंकि प्रत्यक्ष युद्ध के स्थान पर अप्रत्यक्ष संघर्ष और सामरिक प्रतिस्पर्धा बढ़ी।
युद्धों के बाद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण हुई। संयुक्त राष्ट्र संगठन की स्थापना सामूहिक सुरक्षा और वैश्विक शांति के उद्देश्य से की गई। इसके साथ ही विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अन्य बहुपक्षीय संस्थाएँ आर्थिक स्थिरता और विकास को बढ़ावा देने के लिए बनीं। इन संस्थाओं ने यह दर्शाया कि वैश्विक समस्याओं का समाधान केवल राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि सामूहिक सहयोग से संभव है।
इस प्रकार, दोनों विश्व युद्धों ने न केवल सत्ता-संतुलन को पुनर्परिभाषित किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों की संरचना, कूटनीति की प्रकृति और वैश्विक शासन की अवधारणा को भी स्थायी रूप से प्रभावित किया। आधुनिक विश्व व्यवस्था इन्हीं ऐतिहासिक परिवर्तनों की देन है, जहाँ शक्ति और सहयोग दोनों साथ-साथ चलते हैं।
उदाहरण 1: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका–सोवियत संघ का उदय
1945 में जब द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ, तब ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसी पारंपरिक यूरोपीय शक्तियाँ आर्थिक और सैन्य रूप से कमजोर हो चुकी थीं। इस शक्ति-रिक्तता को दो नई महाशक्तियों ने भरा-
United States और
Soviet Union।
इन दोनों देशों के पास विशाल सैन्य क्षमता, परमाणु हथियार और वैचारिक प्रभाव था। परिणामस्वरूप विश्व द्विध्रुवीय (bipolar) व्यवस्था में बदल गया। यही स्थिति आगे चलकर Cold War के रूप में सामने आई।
यह शक्ति संतुलन का उदाहरण इसलिए है क्योंकि:
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दोनों महाशक्तियाँ सीधे युद्ध से बचती रहीं (परमाणु संतुलन के कारण)
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लेकिन कोरिया, वियतनाम, अफगानिस्तान जैसे क्षेत्रों में अप्रत्यक्ष संघर्ष हुए
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विश्व राजनीति दो गुटों-नाटो
