अध्याय-1 सुबह 5 बजे से शुरू होने वाली अर्थव्यवस्था
Synopsis
सुबह के 5 बजकर 07 मिनट।
अलार्म बजने से कुछ सेकंड पहले ही उसकी आँख खुल जाती है।
आदत बन चुकी है। शरीर खुद ही समय पहचान लेता है। घर अभी सो रहा है। दीवारों पर सन्नाटा टंगा है। घड़ी की टिक-टिक और रसोई के नल से टपकती एक-आध बूँद की आवाज़ ही सुनाई देती है।
लेकिन अर्थव्यवस्था जाग चुकी है।
वह धीरे से उठती है, ताकि किसी की नींद न टूटे। चप्पल भी सावधानी से पहनती है। कमरे की लाइट नहीं जलाती। मोबाइल की हल्की रोशनी में रास्ता देखती हुई रसोई तक पहुँचती है।
पहला काम — गैस पर पानी चढ़ाना।
दूसरा — आटा निकालना।
तीसरा — बच्चों के टिफिन के बारे में सोचना।
आज क्या बनेगा?
यह प्रश्न हर सुबह नया होता है, लेकिन जवाब उसे ही देना होता है।
दिन की पहली योजना
रसोई में चाय उबल रही है, लेकिन उसके दिमाग में आज का पूरा दिन उबल रहा है।
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बच्चे की आज यूनिट टेस्ट है।
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पति की मीटिंग है, उन्हें समय पर निकलना होगा।
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दूध कल थोड़ा कम बचा था, आज लाना पड़ेगा।
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गैस का सिलेंडर भी शायद खत्म होने वाला है।
कोई डायरी नहीं खुली है। कोई प्लानर नहीं रखा है। लेकिन उसका दिमाग एक अनकहा मैनेजर है — हर चीज़ याद रखता है।
उसे कोई वेतन नहीं मिलता।
लेकिन उसकी योजना पर पूरा घर चलता है।
6:00 बजे — पहला आवाज़ “माँ…”
कमरे से आवाज़ आती है, “माँ, पाँच मिनट और…”
वह मुस्कुराती है।
खुद पाँच मिनट और नहीं सो पाई।
वह बच्चे को उठाती है। पानी गर्म करती है। यूनिफॉर्म निकालती है। टिफिन पैक करती है। दूध का गिलास सामने रखती है।
उसी समय दूसरी आवाज़ —
“मेरी शर्ट प्रेस हुई है ना?”
वह तुरंत अलमारी की ओर जाती है।
कल रात ही प्रेस की थी। लेकिन फिर भी एक बार और हाथ फेर देती है।
