अध्याय-4 “तुम करती ही क्या हो?”
Synopsis
कुछ वाक्य ऐसे होते हैं
जो चाकू की तरह नहीं,
लेकिन धीरे-धीरे आत्मा को काटते रहते हैं।
“तुम करती ही क्या हो?”
यह सवाल अक्सर जिज्ञासा से नहीं,
अहसास दिलाने के लिए पूछा जाता है —
कि तुम्हारा काम ‘काम’ नहीं है।
वह क्षण
शाम का समय है।
वह पूरे दिन के बाद थकी हुई है।
रसोई से आख़िरी रोटी निकल रही है।
तभी आवाज़ आती है —
“इतना थकने जैसा क्या है? तुम तो घर पर ही रहती हो।”
वह चुप हो जाती है।
वह समझाती नहीं।
बहस नहीं करती।
बस मुस्कुरा देती है।
लेकिन भीतर कुछ टूटता है।
शब्दों का वजन
यह सिर्फ एक वाक्य नहीं है।
यह एक धारणा है।
कि जो पैसा नहीं कमाता —
वह योगदान नहीं देता।
कि जो घर के अंदर है —
वह बाहर जितना महत्वपूर्ण नहीं है।
लेकिन क्या श्रम की कीमत सिर्फ वेतन से तय होगी?
अगर ऐसा है,
तो माँ का दूध भी मुफ्त है —
क्या उसका कोई मूल्य नहीं?
