अध्याय-6 त्याग की आदत
Synopsis
त्याग एक बार किया जाए तो वह निर्णय होता है।
बार-बार किया जाए तो वह आदत बन जाता है।
और गृहिणी के जीवन में त्याग
धीरे-धीरे आदत बन जाता है।
इतनी सहज आदत,
कि उसे खुद भी महसूस नहीं होता
कि उसने फिर से खुद को पीछे रख दिया है।
“पहले बच्चों का…”
बाज़ार में वह साड़ी देखती है।
रंग उसे पसंद आता है।
कीमत देखती है।
रुक जाती है।
दिमाग में आवाज़ आती है —
“अभी बच्चों की फीस देनी है।”
“त्योहार आ रहा है।”
“घर के लिए ज़रूरी चीज़ पहले।”
और साड़ी वापस टांग दी जाती है।
यह कोई बड़ा त्याग नहीं दिखता।
लेकिन यह हर बार दोहराया जाता है।
धीरे-धीरे
उसकी पसंद आखिरी प्राथमिकता बन जाती है।
