अध्याय-7 बेटियों की आँखों में

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बच्चे सिर्फ बातें नहीं सुनते, 
वे जीवन देख रहे होते हैं। 

घर में जो रोज़ होता है, 
वही उनकी दुनिया की परिभाषा बन जाता है। 

और जब एक बेटी अपनी माँ को देखती है — 
वह सिर्फ माँ को नहीं देख रही होती, 
वह अपने भविष्य की एक तस्वीर देख रही होती है। 

छोटी-सी लड़की और उसकी माँ 

एक पाँच साल की बच्ची अपनी माँ के पीछे-पीछे चलती है। 
रसोई में। 
बर्तन धोते समय। 
कपड़े तह करते समय। 

वह पूछती है — 
“माँ, आप हमेशा काम क्यों करती हो?” 

माँ मुस्कुराकर कहती है — 
“क्योंकि घर चलाना है।” 

बेटी चुप हो जाती है। 
लेकिन उसके भीतर एक विचार जन्म लेता है — 
घर चलाना = माँ का काम।  

बेटियाँ क्या सीखती हैं? 

वे देखती हैं: 

  • माँ सबसे पहले उठती है। 

  • माँ सबसे बाद में सोती है। 

  • माँ सबसे कम शिकायत करती है। 

  • माँ की थकान पर अक्सर कोई ध्यान नहीं देता। 

धीरे-धीरे वह मान लेती है — 
यही सामान्य है। 

अगर माँ को कभी यह कहते सुनती है — 
“मुझे कुछ नहीं चाहिए” 

तो वह भी सीख लेती है — 
अपनी ज़रूरतें पीछे रखना। 

Published

March 8, 2026

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How to Cite

अध्याय-7 बेटियों की आँखों में . (2026). In अदृश्य श्रम:  महिलाओं का वह कार्य  जो अर्थव्यवस्था  को जीवित रखता है. Wissira Press. https://books.wissira.us/index.php/WIL/catalog/book/70/chapter/565